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| Omkar |
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| Trouble Viewing Hindi Font? |
| नाम-सà¥à¤®à¤¿à¤°à¤£ की बà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾à¤¦ है à¥à¤•ार साधना |
मारे धरà¥à¤®à¤¶à¤¾à¤¸à¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में à¥à¤•ार को परमातà¥à¤®à¤¾ का वाचक कहा गया है। उसके माधयम से हम बड़ी आसानी से अपनी अंतरातà¥à¤®à¤¾ के देश की सैर कर सकते हैं। कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि ॠकोई साधरण शबà¥à¤¦ नहीं है बलà¥à¤•ि यह अपने आप में संपूरà¥à¤£ बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¾à¤‚ड का सार है, बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¾à¤‚ड-नायक परमातà¥à¤®à¤¾ का वाचक है, समसà¥à¤¤ शबà¥à¤¦à¥‹à¤‚ के सार शबà¥à¤¦ बà¥à¤°à¤¹à¥à¤® का वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ सà¥à¤µà¤°à¥‚प है। यह अखिल बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¾à¤‚ड के कण-कण में समाया हà¥à¤† है। अत: जहां हम अपनी मन-बà¥à¤§à¥à¤¦à¤¿ की सहायता से नहीं पहà¥à¤‚च सकते, वहां की à¤à¥€ यातà¥à¤°à¤¾ हम à¥à¤•ार की सहायता से बड़ी आसानी से पूरी कर सकते हैं।
जब हम à¥à¤•ार का गूॠरहसà¥à¤¯ जानने वाले किसी गà¥à¤°à¥ से à¥à¤•ार के जाप और उसमें लीन होने की विधि सीखकर उसमें लीन हो जाते हैं तो बड़ी आसानी से हम सरà¥à¤µ वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤• परमातà¥à¤®à¤¾ तक, जो हमारे अंदर हमारी ही अंतरातà¥à¤®à¤¾ के रूप में विराजमान है, उसके सानà¥à¤¨à¤¿à¤§à¤¯ में पहà¥à¤‚च जाते हैं। |
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फलसà¥à¤µà¤°à¥‚प हम अविनाशी व आनंद सà¥à¤µà¤°à¥‚प परमातà¥à¤®à¤¾ के ही अंश अपनी अंतरातà¥à¤®à¤¾ में सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ सचà¥à¤šà¥€ शानà¥à¤¤à¤¿ व सकून को हासिल कर पाने में सफल होते हैं। इस पà¥à¤°à¤•ार हम इस नाशवान à¤à¥Œà¤¤à¤¿à¤• शरीर से à¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ अपने अविनाशी सà¥à¤µà¤°à¥‚प में सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ होकर अमरता के à¤à¥‚ले में à¤à¥‚लने लगते हैं। तब उस अवसà¥à¤¥à¤¾ में हमें सांसारिक चिंताà¤à¤‚, उलà¤à¤¨à¥‡à¤‚ व नाना पà¥à¤°à¤•ार की समसà¥à¤¯à¤¾à¤à¤‚ घेर कर हमें दà¥à¤–ी करने में असमरà¥à¤¥ हो जाती हैं। |
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| à¥à¤•ार के बाद से ही इस सृषà¥à¤Ÿà¤¿ की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ मानी जाती है। अत: à¥à¤•ार का बहà¥à¤¤ महतà¥à¤µ है। सबसे पहले à¥à¤•ार की धà¥à¤µà¤¨à¤¿ हà¥à¤ˆà¥¤ धà¥à¤µà¤¨à¤¿ से नाद उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ हà¥à¤† और नाद से ही इस सृषà¥à¤Ÿà¤¿ की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ हà¥à¤ˆà¥¤ इस चराचर जगत में जो कà¥à¤› à¤à¥€ है, जो à¤à¥€ जड़ पदारà¥à¤¥ या चेतन पà¥à¤°à¤¾à¤£à¥€ हैं, सब नाद बà¥à¤°à¤¹à¥à¤® की ही अà¤à¤¿à¤µà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ हैं। अब विचार करने की बात है कि हमें à¥à¤•ार से उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ नाद बà¥à¤°à¤¹à¥à¤® की अनà¥à¤à¥‚ति कैसे होती है? |
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à¥à¤•ार नाद à¤à¤• अलौकिक तरंग
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जब à¥à¤•ार नाद हमारे अंदर धà¥à¤µà¤¨à¤¿ बनकर पà¥à¤°à¤µà¥‡à¤¶ करता है तब उस धà¥à¤µà¤¨à¤¿ से à¤à¤• अलौकिक तरंग उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ होती है, उस तरंग से à¤à¤• पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤§à¥à¤µà¤¨à¤¿ पैदा होती है और वह पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤§à¥à¤µà¤¨à¤¿ जो नाद पैदा करती है, वही नाद बाद में बà¥à¤°à¤¹à¥à¤® के रूप में परिवरà¥à¤¤à¤¿à¤¤ हो जाता है। और तब वह हमारे अंदर अनहद रूप में पà¥à¤°à¤•ट हो कर हमें अपना साकà¥à¤·à¤¾à¤¤à¥à¤•ार करा देता हैं। जब हम à¥à¤•ार का उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ करते हैं तो उससे हमारे आस-पास का पूरा परिवेष अनादि बà¥à¤°à¤¹à¥à¤® के सà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤² से तारतमà¥à¤¯ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ कर पवितà¥à¤° हो जाता है। इसका लाठयह होता है कि बà¥à¤°à¥‡ विचार हमारे अंदर आसानी से पहà¥à¤‚च नहीं पाते और जब हम अपने अंदर में à¥à¤•ार के अनहद नाद की अनà¥à¤à¥‚ति करते हैं तो हमारे अंदर का सारा कलà¥à¤¶ à¤à¥€ धà¥à¤²à¤¨à¥‡ लगता है, हमारी मानसिक उथल-पà¥à¤¥à¤² शानà¥à¤¤ होने लगती है। à¥à¤•ार की धà¥à¤µà¤¨à¤¿ अनहद बनकर हमारे अंदर पà¥à¤°à¤µà¥‡à¤· कर जाती है। और नाद की तरंगों का à¤à¤¸à¤¾ पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ पड़ता है कि हमारे अंदर असीम परमातà¥à¤®à¤¾ के शनà¥à¤¤à¤¿ सà¥à¤µà¤°à¥‚प की अनà¥à¤à¥‚ति होने लगती है। à¥à¤•ार नाद की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ नाà¤à¤¿ से होती है, जहां कà¥à¤‚डलिनी योग के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° मणिपूरक च सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ है। नाà¤à¤¿ में ही अमृत ऊरà¥à¤œà¤¾ à¤à¤°à¥€ हà¥à¤ˆ है और जब हम उसे à¥à¤•ार के उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ के माधà¥à¤¯à¤® से जागà¥à¤°à¤¤ करते हैं तो मणिपà¥à¤° चकà¥à¤° में समाया अगà¥à¤¨à¤¿ ततà¥à¤µ à¤à¥€ जागà¥à¤°à¤¤ हो जाता है और सà¥à¤¶à¥à¤®à¥à¤¨à¤¾ नाड़ी के माधयम से ऊपर उठने लगता है। सà¥à¤¶à¥à¤®à¥à¤¨à¤¾ नाड़ी हमारी रीॠकी हडà¥à¤¡à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के बीचों बीच पà¥à¤°à¤µà¤¾à¤¹à¤¿à¤¤ होती है, उसके सहारे ऊपर उठती हà¥à¤ˆ अगà¥à¤¨à¤¿ ततà¥à¤µ की तरंगें और अधिक तेजसà¥à¤µà¥€ होते हà¥à¤ हमारे हृदय सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ अनाहत चकà¥à¤°, कंठसà¥à¤¥à¤¿à¤¤ विषà¥à¤§à¥à¤¦ चकà¥à¤°, à¤à¥Œà¤‚हों के मधय सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ आजà¥à¤à¤¾ चकà¥à¤° होते हà¥à¤ अंतत: बà¥à¤°à¤¹à¥à¤® रंधà¥à¤° में सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ सहसà¥à¤°à¤¾à¤° चकà¥à¤° में पहà¥à¤‚च जाती हैं और वहां से वह पहले से à¤à¥€ जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ परिषà¥à¤•ृत व पà¥à¤°à¤–र होकर अपनी ही आतà¥à¤®à¤¾ में सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ परमातà¥à¤®à¤¾ के पà¥à¤°à¤•ाश से हमारे अपने ही आपा के अंदर आनंद की बाॠला देती है। होता यह है कि जब नाà¤à¤¿ से उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ होने वाली परावाणी से ॠका उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ होता है तो वहां से उठने वाली तरंगें हमारे पिणà¥à¤¡ के बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¾à¤‚ड में सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ पतली à¤à¤¿à¤²à¥à¤²à¥€ को राहत पहà¥à¤‚चाती हैं जिसके घरà¥à¤·à¤£ से वहां ऋण व धन आवेश का सृजन होता है। उनके मिलने से वहां पà¥à¤°à¤•ाश की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ होती है जो आनंद रस से सराबोर रहता है। हमारे अपने ही आपा के अंदर सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ परमातà¥à¤®à¤¾ में जà¥à¤à¤¾à¤¨ का à¤à¤• à¤à¤¸à¤¾ अनमोल खजाना à¤à¤°à¤¾ हà¥à¤† है जो हमारे जीवन की सारी दà¥à¤–-दरिदà¥à¤°à¤¤à¤¾ को दूर कर हमें सही मायनों में मालामाल कर देता है। जब हमारी बूंद जैसी छोटी सी हैसियत समà¥à¤¦à¥à¤° के समान असीम परमातà¥à¤®à¤¾ से जà¥à¥œ अति विशाल हो जाती है तब हम अजà¥à¤à¤¾à¤¨à¤¤à¤¾ के बंधन में जकड़े मातà¥à¤° जीव नहीं रहते, शिव सà¥à¤µà¤°à¥‚प हो जाते हैं। किनà¥à¤¤à¥ इस सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ तक पहà¥à¤‚चने के पहले हमें à¥à¤•ार के उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ सें बाहà¥à¤¯ व आनà¥à¤¤à¤¿à¤°à¤¿à¤• परिवेश को पवितà¥à¤° करने की पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ के पà¥à¤°à¤¾à¤¥à¤®à¤¿à¤• चरण को समà¤à¤¨à¤¾ होगा। à¥à¤•ार अ, उ और म का à¤à¤•ीकृत रूप हैं। इसका उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ नाà¤à¤¿, हृदय, कंठऔर होंठों की समवेत सहायता से निषà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¿à¤¤ होता है। उसे बाहà¥à¤¯ उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ से पलट कर आतà¥à¤®-केंदà¥à¤°à¤¿à¤¤ करना चाहिà¤à¥¤ इस च को गà¥à¤°à¥ चकà¥à¤° à¤à¥€ कहते हैं। इस च पर सफेद दो दलों वाले कमल पर आसीन सफेद वसà¥à¤¤à¥à¤° पहने हà¥à¤ गà¥à¤°à¥à¤œà¥€ की मूरà¥à¤¤à¤¿ का धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ करने का विधान है। उस समय में यह à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ à¤à¥€ करनी चाहिठकि वहां चारों ओर सफेद पà¥à¤°à¤•ाश फैल रहा है। अà¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸ पà¥à¤°à¤—ाॠहोने पर साधकों को सà¥à¤µà¤¤: रंग-बिरंगे पà¥à¤°à¤•ाश व आवृतà¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ की à¤à¤²à¤• à¤à¥€ देखने को मिलने लगती हैं जिससे साधकों को अलौकिक आनंद की अनà¥à¤à¥‚ति होती है।
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अंतरà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤°à¤¾ की बà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾à¤¦ है à¥à¤•ार साधना |
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अत: गà¥à¤°à¥ के निरà¥à¤¦à¥‡à¤·à¥‹à¤‚ का पालन करते हà¥à¤ नियमित अà¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸ करने से साधकजनों को à¥à¤•ार के माधà¥à¤¯à¤® से बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®-रंधà¥à¤° सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ सहसà¥à¤°à¤¾à¤° पर परम जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿ के à¤à¥€ दरà¥à¤·à¤¨ होने लगते हैं। सारी की सारी परेशानी सारी चिंताà¤à¤‚ और सारी समसà¥à¤¯à¤¾à¤à¤‚ बà¥à¤°à¤¹à¥à¤® की अगà¥à¤¨à¤¿ में à¤à¤¸à¥à¤® हो जाती हैं और वह अपने अंदर à¤à¤• नयी ऊरà¥à¤œà¤¾ और नये उतà¥à¤¸à¤¾à¤¹ का समà¥à¤¦à¥à¤° लहराता हà¥à¤† देखता है। उसे जीवन में आने वाले सांसारिक सà¥à¤–-दà¥à¤– पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ नहीं करते और वह अपनी अंतरजगत की यातà¥à¤°à¤¾ में हà¥à¤ सà¥à¤•ून का आनंद लेता रहता है। लेकिन उकà¥à¤¤ सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ में कोई à¤à¥€ साधक à¤à¤•ाà¤à¤• नहीं पहà¥à¤‚च सकता। इसके लिठसाधक को दृॠसकलà¥à¤ª का धनी और धैरà¥à¤¯ की साकà¥à¤·à¤¾à¤¤ मूरà¥à¤¤à¤¿ बनना पड़ता है। थोड़ी सी à¤à¥€ जलà¥à¤¦à¥€à¤¬à¤¾à¤œà¥€ सारे किये-कराये पर पानी फेर सकता है, साधक को लाठके बदले हानि उठानी पड़ सकती है। वासà¥à¤¤à¤µ में उकà¥à¤¤ सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ बिना मानसिक व वैचारिक उथल-पà¥à¤¥à¤² को शांत हà¥à¤ किसी à¤à¥€ तरह पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ नहीं हो सकती। किसी मानसिक तनाव से गà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¤ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ के लिठतो उकà¥à¤¤ सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ की कलà¥à¤ªà¤¨à¤¾ करना à¤à¥€ टेà¥à¥€ खीर है। अत: à¥à¤•ार की साधना की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ करने के पहले इस तथà¥à¤¯ को अचà¥à¤›à¥€ तरह समठलेना चाहिठकि यह साधना बाहà¥à¤¯ संसार की यातà¥à¤°à¤¾ से पूरà¥à¤£à¤¤: à¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ है और इसके लिठकी जाने वाली तैयारी à¤à¥€ अपने आप में अनूठी और बेजोड़ है। बाहà¥à¤® संसार की किसी à¤à¥€ कारà¥à¤¯ पधà¥à¤¦à¤¤à¤¿ से इसकी तà¥à¤²à¤¨à¤¾ नहीं की जा सकती। इसके लिठहमें अपने मन को विचार शूनà¥à¤¯, सà¥à¤¸à¥à¤¥à¤¿à¤° और अथाह धैरà¥à¤¯ से यà¥à¤•à¥à¤¤ बनाना आवशà¥à¤¯à¤• है। सनातन काल से इस विशय पर à¤à¤°à¤ªà¥‚र पà¥à¤°à¤•ाश डाला गया है कि हम किस पà¥à¤°à¤•ार अपने मन को नियंतà¥à¤°à¤¿à¤¤ कर सकते हैं। हमारे ऋषि-मà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ ने मन को नियंतà¥à¤°à¤¿à¤¤ करने के जिन उपायों का जि किया है उनमें मंतà¥à¤° साधना को विषेश महतà¥à¤µ दिया गया है। वासà¥à¤¤à¤µ में जब हम 'मंतà¥à¤°' शबà¥à¤¦ की वà¥à¤¯à¥à¤¤à¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ पर विचार करते हैं तो हमारे समकà¥à¤· यही बात सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ होती है कि जिसके दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ मन पर नियंतà¥à¤°à¤£ किया जा सके, जो मन रूपी घोड़े को नियंतà¥à¤°à¤£ की लगाम से काबू में रखने की शकà¥à¤¤à¤¿ से यà¥à¤•à¥à¤¤ हो, उसी को मंतà¥à¤° कहते हैं। किंतॠहमारे पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ महरà¥à¤·à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ ने बिना किसी पूरà¥à¤µ तैयारी के à¤à¤•ाà¤à¤• मंतà¥à¤° साधना में कूद पड़ने की इजाजत नहीं दी है। उसके पहले किसी अनà¥à¤à¤µà¥€ मारà¥à¤—दरà¥à¤¶à¤• दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ विधिवत दीकà¥à¤·à¤¾ गà¥à¤°à¤¹à¤£ कर उसके दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ बतायी गयी विधियों का अनà¥à¤¸à¤°à¤£ करना आवशà¥à¤¯à¤• बताया गया है। जिजà¥à¤à¤¾à¤¸à¥ साधकों को सरà¥à¤µà¤ªà¥à¤°à¤¥à¤® समय के मारà¥à¤—दरà¥à¤¶à¤• के सानà¥à¤¨à¤¿à¤§à¤¯ में जाकर मंतà¥à¤° के विनियोग और नà¥à¤¯à¤¾à¤¸à¥‹à¤‚ की जानकारी हासिल करनी होती है जिसके माधà¥à¤¯à¤® से वे अपने शरीर को à¤à¥€ मंतà¥à¤° साधना के लिठअपेकà¥à¤·à¤¿à¤¤ परिवेश में सà¥à¤¸à¥à¤¥à¤¿à¤° रहने का अà¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸à¥€ बना सकें। देश, काल, पातà¥à¤° और परिसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ à¤à¥‡à¤¦ से मारà¥à¤—दरà¥à¤¶à¤• जिजà¥à¤à¤¾à¤¸à¥à¤“ं को आवशà¥à¤¯à¤• यम, नियम, आसन, बंध, मà¥à¤¦à¥à¤°à¤¾à¤“ं व पà¥à¤°à¤¾à¤£à¤¾à¤¯à¤¾à¤® आदि का सहारा लेने का निदेश देता है। कà¥à¤› लोग किताबें पà¥à¤•र या दूसरों की देखा-देखी सà¥à¤µà¤¤: मंतà¥à¤° साधना के कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में अगà¥à¤°à¤¸à¤° होते हैं। किंतॠवैसे लोगों को कà¤à¥€ à¤à¥€ लकà¥à¤·à¥à¤¯ तक पहà¥à¤‚चते नहीं देखा गया है। अधिकतर लोग लाठके बदले हानि उठाते हैं और लकà¥à¤·à¥à¤¯ à¤à¥à¤°à¤·à¥à¤Ÿ होकर इधर-उधर à¤à¤Ÿà¤• जाते हैं। अत: इसमें समय के मारà¥à¤—दरà¥à¤¶à¤• का सानà¥à¤¨à¤¿à¤§à¥à¤¯ पाना à¤à¤• अहमॠपहलू है जिसे कà¤à¥€ à¤à¥€ नजरंदाज नहीं किया जा सकता। अनà¥à¤à¤µà¥€ मारà¥à¤—दरà¥à¤¶à¤• किसी à¤à¥€ साधक की शारीरिक व मानसिक सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ देखते हà¥à¤ ही उसके लिठउचित साधन का निरà¥à¤¦à¥‡à¤¶ देता है। उसकी समठके सà¥à¤¤à¤° को धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ में रखते हà¥à¤ ही उसको उसकी बोली में समà¤à¤¾à¤¤à¤¾ है। साधक जिस सà¥à¤¤à¤° पर रहता है। मारà¥à¤—दरà¥à¤¶à¤• उसी सà¥à¤¤à¤° पर उतर कर उसे और आगे बà¥à¤¨à¥‡ की पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ व पà¥à¤°à¥‹à¤¤à¥à¤¸à¤¾à¤¹à¤¨ देता है। आज के बदलते परिवेश में लोग जिस पà¥à¤°à¤•ार की जीवन शैली के आदी हो गये है, उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ में रखते हà¥à¤ समय का अनà¥à¤à¤µà¥€ मारà¥à¤—दरà¥à¤¶à¤• मंतà¥à¤°-साधना के माधà¥à¤¯à¤® से अंतरà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤°à¤¾ करने के इचà¥à¤›à¥à¤• लोगों को उनके समà¤à¤¨à¥‡ के सà¥à¤¤à¤° और लगन के अनà¥à¤°à¥‚प मंतà¥à¤°à¤¦à¥€à¤•à¥à¤·à¤¾ और आवशà¥à¤¯à¤• निरà¥à¤¦à¥‡à¤¶ देता है।
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साधना में अवशà¥à¤¯à¤• सावधनी
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मंतà¥à¤°à¥‹à¤‚ में अपार शकà¥à¤¤à¤¿ होती है और उनकी संखà¥à¤¯à¤¾ à¤à¥€ महापà¥à¤°à¤à¥ की अनंतता की तरह ही असंखà¥à¤¯ है। सà¤à¥€ मंतà¥à¤°à¥‹à¤‚ की साधना के ढंग अलग-अलग हैं और उनसे मिलने वाले फल à¤à¥€ à¤à¤¾à¤‚ति-à¤à¤¾à¤‚ति के होते हैं। किंतॠसà¤à¥€ मंतà¥à¤°à¥‹à¤‚ से निकलने वाले सà¥à¤¥à¥‚ल व सूकà¥à¤·à¥à¤® नाद à¥à¤•ार जैसी धà¥à¤µà¤¨à¤¿ से ओतपà¥à¤°à¥‹à¤¤ होते हैं और उनकी साधना पूरà¥à¤£ होने पर जो फल साधकों को उपलबà¥à¤§ होते हैं, उनमें आनंद का रस इतना पà¥à¤°à¤—ाॠहोता है कि साधक उस रस का पान करने में मसà¥à¤¤ हो जाता है। उसे यह देखने-सà¥à¤¨à¤¨à¥‡ की à¤à¥€ फà¥à¤°à¤¸à¤¤ नहीं रहती कि दूसरे साधकों के फलों की आकृति व सà¥à¤—ंध कैसी है। वह तो अपनी à¤à¥‹à¤²à¥€ में मिले फल के रस का रसपान करने में ही लीन हो जाता है। उसे तो अपनी à¤à¥‹à¤²à¥€ में मिले फल के रसासà¥à¤µà¤¾à¤¦à¤¨ में ही इतना रस मिलने लगता है कि उसे दूसरों की à¤à¥‹à¤²à¥€ की ओर देखने की फà¥à¤°à¤¸à¤¤ ही नहीं होती। केवल वही लोग दूसरों की à¤à¥‹à¤²à¥€ में ताकने-à¤à¤¾à¤‚कने के चकà¥à¤•र में पड़ते हैं, जिनकी अपनी à¤à¥‹à¤²à¥€ में कà¥à¤› नहीं रहता। सावधन, साधना के दौर में या साधना की सिधà¥à¤¦à¤¿ के उपरांत à¤à¥€ दूसरों की à¤à¥‹à¤²à¥€ में ताकने-à¤à¤¾à¤‚कने की पà¥à¤°à¤µà¥ƒà¤¤à¥à¤¤à¤¿ को अपने ऊपर हावी नहीं होने चाहिà¤, à¤à¤¸à¥€ पà¥à¤°à¤µà¥ƒà¤¤à¥à¤¤à¤¿ बड़ी निकृषà¥à¤Ÿ होती है। à¤à¤¸à¥‡ लोग कà¤à¥€ à¤à¥€ अपने परम लकà¥à¤·à¥à¤¯ तक पहà¥à¤‚च नहीं सकते।
संà¤à¤µ है आप में से कई लोगों के अंदर यह पà¥à¤°à¤¶à¥à¤¨ उठरहा हो कि जब मंतà¥à¤° अनंत हैं तो मैं आप सबको à¥à¤•ार के ही माधयम से साधना की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ करने की बात कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ कह रहा हूं। लेकिन इस पà¥à¤°à¤•ार का पà¥à¤°à¤¶à¥à¤¨ बेमानी है। कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि यदि आपने à¥à¤•ार के संबंध में दिये गये परिचय पर गौर किया होगा तो यह अपने आप सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ हो गया होगा कि à¥à¤•ार कोई साधारण शबà¥à¤¦ नहीं है। यह सà¥à¤µà¤¯à¤‚ उस परमसतà¥à¤¤à¤¾ का वाचक है जिसकी सतà¥à¤¤à¤¾ से हम, आप, यह अखिल विशà¥à¤µ और सारे मंतà¥à¤°-तंतà¥à¤°, पूजा-पाठअथवा योग-साधनाà¤à¤‚ जीवंत हो रही हैं।
à¥à¤•ार उस परमसतà¥à¤¤à¤¾ का वाचक या पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¨à¤¿à¤§à¤¿ मातà¥à¤° ही नहीं, साकà¥à¤·à¤¾à¤¤ वह परमसतà¥à¤¤à¤¾ ही है। बस जरूरत है, उसे उस दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से निहारने की जिस दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से वह अपने असली रूप में नजर आता है। किंतॠउस दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से निहारने की योगà¥à¤¯à¤¤à¤¾ हासिल करने के लिठहमें अपने मन को तैयार करना होगा और मन को तैयार करने के पहले अपने तन को संà¤à¤¾à¤²à¤¨à¤¾ व समेटना होगा। |
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à¥à¤•ार साधना की महिमा |
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à¥à¤•ार साधना पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤‚ठकरने से पहले मेरे विचार से à¤à¤• बार पà¥à¤¨:à¥à¤•ार के संबंध में विविध गà¥à¤°à¤¥à¥‹à¤‚ व अनà¥à¤à¤µà¥€ मनीषियों के उदà¥à¤—ारों पर à¤à¥€ गौर कर लेना आवशà¥à¤¯à¤• है। ॠपरमातà¥à¤®à¤¾ को इंगित करने वाला सरà¥à¤µà¤¶à¥à¤°à¥‡à¤·à¥à¤ à¤à¤•ाकà¥à¤·à¤° मंतà¥à¤° है। आदà¥à¤¯ शंकराचारà¥à¤¯ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° जिस पà¥à¤°à¤•ार हम लोग अपने पà¥à¤°à¤¿à¤¯ नाम से संबोधित करने पर पà¥à¤°à¤¸à¤¨à¥à¤¨ होते हैं, उसी पà¥à¤°à¤•ार परमातà¥à¤®à¤¾ à¤à¥€ à¥à¤•ार से पà¥à¤•ारे जाने पर शीघà¥à¤° पà¥à¤°à¤¸à¤¨à¥à¤¨ होकर साधक को वांछित आनंद पà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¨ कर उसे कृतकृतà¥à¤¯ करते हैं। à¤à¤¾à¤°à¤¤ की पवितà¥à¤° धरती पर विकसित वैदिक, तांतà¥à¤°à¤¿à¤•, शैव, वैषà¥à¤£à¤µ, गाणपतà¥à¤¯, बौधà¥à¤¦, जैन और सिख आदि सà¤à¥€ संपà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¥‹à¤‚ में à¥à¤•ार को सबसे अधिक महतà¥à¤µ दिया गया है। यहां तक कि इसलाम व ईसाई मतावलंबी à¤à¥€ 'आमीन' व 'ओमन' का उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ कर à¥à¤•ार धà¥à¤µà¤¨à¤¿ की उपादेयता और सरà¥à¤µ शà¥à¤°à¥‡à¤·à¥à¤ ता की हामी à¤à¤°à¤¤à¥‡ हैं। वैदिक मंतà¥à¤°à¥‹à¤‚ का उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ करते समय सरà¥à¤µà¤ªà¥à¤°à¤¥à¤® à¥à¤•ार का उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ करने की सनातन परंपरा निररà¥à¤¥à¤• नहीं है। बलà¥à¤•ि इसके पीछे à¤à¤• गूॠबात छिपी हà¥à¤ˆ है कि यह à¤à¤• à¤à¤¸à¥€ कà¥à¤‚जी है जिसके बिना कोई à¤à¥€ मंतà¥à¤° सारà¥à¤¥à¤• नहीं हो पाते। गोपथ बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¤£ में 'à¥à¤•ार: à¤à¤•ाकà¥à¤·à¤°à¤¾ ऋकà¥' कहते हà¥à¤ यह सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ किया गया है कि किसी à¤à¥€ वेद मंतà¥à¤° के उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ से पूरà¥à¤µ तथा यजà¥à¤à¤¾à¤¨à¥à¤·à¥à¤ ान के समय सबसे पहले à¥à¤•ार का उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ इसलिठकिया जाता है, ताकि मंतà¥à¤°à¤—त, तपोगत, शूशà¥à¤°à¥à¤·à¤¾-साहितà¥à¤¯ अथवा अनधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ के कारण यदि कोई नà¥à¤¯à¥‚नता रह गयी हो, तो उसकी पूरà¥à¤¤à¤¿ करते हà¥à¤ उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ तेजसॠसे पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने योगà¥à¤¯ बनाया जा सके।
अथरà¥à¤µà¤µà¥‡à¤¦ से संबधà¥à¤¦ मà¥à¤‚डकोपनिशद में तो à¤à¤• बड़े ही सà¥à¤‚दर रूपक के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ à¥à¤•ार की महिमा का गान किया गया है |
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पà¥à¤°à¤£à¤µà¥‹ धनà¥: शरो हà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¾ बà¥à¤°à¤¹à¥à¤® तलà¥à¤²à¤•à¥à¤·à¥à¤¯à¤®à¥à¤šà¥à¤¯à¤¤à¥‡ ।
अपà¥à¤°à¤®à¤¤à¥à¤¤à¥‡à¤¨ वेधà¥à¤¦à¤µà¥à¤¯à¤‚ शरवतà¥à¤¤à¤¨à¥à¤®à¤¯à¥‹ à¤à¤µà¥‡à¤¤à¥ ॥
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यानी साधक को चाहिठकि वह à¥à¤•ार रूपी धनà¥à¤¶ पर आतà¥à¤®à¤¾ रूपी बाण का संधन करके वह परबà¥à¤°à¤¹à¥à¤® रूप लकà¥à¤·à¥à¤¯ का वेध करने के लिठपà¥à¤°à¤®à¤¾à¤¦ रहित होकर निशाना साधे। अपने इस कारà¥à¤¯ में उसे बाण की तरह à¤à¤•ागà¥à¤° और खींची हà¥à¤ˆ धनà¥à¤¶ की पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¤‚चा दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ पà¥à¤°à¤¦à¤¤à¥à¤¤à¤¾ गति के साथ तनà¥à¤®à¤¯ हो जाना चाहिà¤à¥¤
इसी उपनिषदॠमें à¤à¤• सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर रथ के पहिये से तà¥à¤²à¤¨à¤¾ देते हà¥à¤ सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ घोशित किया गया है कि रथ के पहिये की नाà¤à¤¿ केनà¥à¤¦à¥à¤° में जà¥à¥œà¥‡ अरों यानी डंडाें की à¤à¤¾à¤‚ति, जिसमें संपूरà¥à¤£ शरीर में वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¥à¤¤ नाड़ियां à¤à¤•तà¥à¤° सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ हैं, उसी नाà¤à¤¿ में वह बहà¥à¤¤ पà¥à¤°à¤•ार से उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ होने वाला अंतरà¥à¤¯à¤¾à¤®à¥€ परमसतà¥à¤¤à¤¾ निवास करती है। अत: उस परमसतà¥à¤¤à¤¾ का संधन à¥à¤•ार नाम से करो। अजà¥à¤à¤¾à¤¨à¤®à¤¯ अंधकार से परे उस परमातà¥à¤® सतà¥à¤¤à¤¾ के समीप पहà¥à¤‚चने, उसी में लीन हो जाने में पà¥à¤°à¤¯à¤¤à¥à¤¨ रत तà¥à¤® लोगों का कलà¥à¤¯à¤¾à¤£ हो।
मांडूकà¥à¤¯à¥‹à¤ªà¤¨à¤¿à¤·à¤¦à¥ के पà¥à¤°à¤¥à¤® मंतà¥à¤° में तो इस बात का और à¤à¥€ खà¥à¤²à¤¾à¤¸à¤¾ किया गया है कि à¥à¤•ार ही सरà¥à¤µà¤¸à¥à¤µ है। वह मंतà¥à¤° कहता है कि 'à¥' अकà¥à¤·à¤° अविनाशी परमातà¥à¤®à¤¾ है। यह संपूरà¥à¤£ जगत उनà¥à¤¹à¥€à¤‚ की महिमा को दरà¥à¤¶à¤¾à¤¨à¥‡ वाला है। जो à¤à¥‚तकाल में हो चà¥à¤•ा है, जो इस समय वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ है और जो आगे होने वाला है, वह सब का सब à¥à¤•ार ही है, वह à¥à¤•ार ही है।
कृषà¥à¤£ यजà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦à¥€à¤¯ शà¥à¤µà¥‡à¤¤à¤¾à¤¶à¥à¤µà¤¤à¤° उपनिषदॠमें à¤à¥€ परमातà¥à¤® सतà¥à¤¤à¤¾ के साकà¥à¤·à¤¾à¤¤à¥à¤•ार के साधन के रूप में à¥à¤•ार की महिमा का गान करते हà¥à¤ यहां तक कहा गया है कि ''जिस पà¥à¤°à¤•ार आशà¥à¤°à¤¯à¤à¥‚त काठमें छिपी आग का सà¥à¤µà¤°à¥‚प दिखायी नहीं देता किंतॠउससे उसके असà¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ-चिनà¥à¤¹ का विनाश नहीं होता, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि वही छिपी हà¥à¤ˆ आग फिर रगड़ने के पà¥à¤°à¤¯à¤¤à¥à¤¨ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ पà¥à¤°à¤œà¥à¤µà¤²à¤¿à¤¤ हो जाती है। ठीक उसी पà¥à¤°à¤•ार à¥à¤•ार के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ साधना करने पर इसी शरीर में उस परमातà¥à¤® सतà¥à¤¤à¤¾ की अà¤à¤¿à¤µà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ हो जाती है।'' ऋषि कहते हैं कि ''साधक अपने शरीर को नीचे की अरणि बनाकर तथा à¥à¤•ार को ऊपर की अरणि बनाकर धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ का निरंतर मंथन करें। इससे वह छिपी हà¥à¤ˆ अगà¥à¤¨à¤¿ के पà¥à¤°à¤•टीकरण के सदृश परमातà¥à¤®à¤¾ का साकà¥à¤·à¤¾à¤¤à¥à¤•ार कर लेगा।''
यही वजह है कि याजà¥à¤à¤µà¤²à¥à¤•à¥à¤¯ सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿ में खà¥à¤²à¥‡ आम यह घोषणा की गयी है कि |
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मांगलà¥à¤¯à¤‚ पावनो धनà¥à¤¯: सरà¥à¤µ काम पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤§à¤¨: ।
à¥à¤•ार परमं बà¥à¤°à¤¹à¥à¤® सरà¥à¤µ मनà¥à¤¤à¥à¤°à¥‡à¤¶à¥ नायक: ।
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अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤à¥ à¥à¤•ार मंगलकारक, पवितà¥à¤° करने वाला, समृधà¥à¤¦à¤¿ पà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¤•, सà¤à¥€ अà¤à¥€à¤·à¥à¤Ÿ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ कराने वाला और सà¤à¥€ मंतà¥à¤°à¥‹à¤‚ का नायक है।
इतना ही नहीं à¤à¤—वदॠगीता के आठवें अधयाय में तो यह सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ घोषित किया गया है कि इस जीवन यातà¥à¤°à¤¾ के अंतिम पड़ाव पर यानी महापà¥à¤°à¤¸à¥à¤¥à¤¾à¤¨ के समय à¥à¤•ार का उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ करने वाला वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ परम गति को पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करता है। किंतॠउस महापà¥à¤°à¤¸à¥à¤¥à¤¾à¤¨ के समय हमसे यह महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ कारà¥à¤¯ हो पायेगा या नहीं, इसकी कà¥à¤¯à¤¾ गारंटी है? अत: मैं चाहता हूं कि हम à¥à¤•ार के माधयम से अंतरà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤°à¤¾ का अà¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸à¥€ बनकर अपने तन-मन में à¥à¤•ार नाद को इस पà¥à¤°à¤•ार रचा-बसा लें कि वहां किसी अनà¥à¤¯ के लिठकोई सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ ही न बचे। हम à¤à¥€à¤¤à¤°-बारह हर तरफ से à¥à¤•ारमय हो जायें, हमारा हर पल à¥à¤•ारमय हो जाये तब हम बड़ी आसानी से महापà¥à¤°à¤¸à¥à¤¥à¤¾à¤¨ के समय परम गति से परमपद को पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ कर परमानंद के सागर में गोते लगायेंगे।
अत: कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ न हम अपने आपको आज से ही अपने महापà¥à¤°à¤¸à¥à¤¥à¤¾à¤¨ को परमानंद रूप बनाने के लिठपà¥à¤°à¤¯à¤¤à¥à¤¨à¤¶à¥€à¤² हो जाà¤à¤‚। लोगों को उसी महायातà¥à¤°à¤¾ की पूरà¥à¤µ तैयारी के लिठपà¥à¤°à¥‹à¤¤à¥à¤¸à¤¾à¤¹à¤¿à¤¤ करने के उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ से मेरे दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ अंतरà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤°à¤¾ शिविरों का समय-समय पर आयोजन करवाया जा रहा है जिसका पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤‚ठà¥à¤•ार के उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ से होता है। à¥à¤•ार में इतनी शकà¥à¤¤à¤¿ निहित है कि यह आपको पूरà¥à¤£à¤¤à¤¯à¤¾ बदल सकता है। यह आपमें नई उमंग और शानà¥à¤¤à¤¿ ला सकता है। à¤à¤• परमानंद रूपी सोने का खजाना जो आपके अनà¥à¤¦à¤° सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ है, उसे यदि आप चाहें तो à¥à¤•ार साधना दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ उस पर पड़ी परत को हटा कर बड़ी सहजता से उस परम आनंद के सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ बन सकते हैं। लेकिन इसके लिठउस खजाने पर पड़ी अजà¥à¤à¤¾à¤¨à¤¤à¤¾ की परत को हटाना बहà¥à¤¤ जरूरी है। और à¥à¤•ार साधना के माधà¥à¤¯à¤® से यह आसानी से संà¤à¤µ à¤à¥€ है। |
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सà¤à¥€ मंतà¥à¤°à¥‹à¤‚ का नायक है à¥à¤•ार |
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मंतà¥à¤°à¥‹à¤‚ में बहà¥à¤¤ शकà¥à¤¤à¤¿ होती है। और à¥à¤•ार सà¤à¥€ मंतà¥à¤°à¥‹à¤‚ का नायक है, पà¥à¤°à¤¾à¤£ है। इसे पà¥à¤°à¤£à¤µ à¤à¥€ कहते हैं। यह महामंतà¥à¤° मन को मार देता है। शरीर से मन के संबंध को यह महामंतà¥à¤° अलग कर देता है। और इनसे अलग होना ही अपनी असली सतà¥à¤¤à¤¾ को पाना है। इस साधना में धैरà¥à¤¯ का होना बहà¥à¤¤ जरूरी है। वरना धैरà¥à¤¯ के बिना बड़ा से बड़ा मंतà¥à¤° à¤à¥€ बोठबन जायेगा। इसकी साधना करने से फल तो अचà¥à¤›à¤¾ मिलता है परंतॠदेर से। महामंतà¥à¤° à¥à¤•ार के माधà¥à¤¯à¤® से साधना का पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤‚ठकरने के लिठसबसे पहले शरीर को सà¥à¤¸à¥à¤¥à¤¿à¤° करने का उदà¥à¤¯à¥‹à¤— किया जाता है। चूंकि हमारे शरीर की मूल पà¥à¤°à¤•ृति सकà¥à¤°à¤¿à¤¯ रहने की, जागà¥à¤°à¤¤ अवसà¥à¤¥à¤¾ में चलते-फिरते रहने की है। अत: अंतरà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤°à¤¾ की साधना में बैठने के पूरà¥à¤µ शरीर को बाहà¥à¤¯ कà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾-कलापों से कà¥à¤› थका देना चाहिठताकि हमारे शरीर को कà¥à¤› समय तक सà¥à¤¥à¤¿à¤° बैठने में आनंद आये, यह सà¥à¤¸à¥à¤¥à¤¿à¤° रह पाये। उसके बाद साधना में बैठना चाहिà¤à¥¤ साधना में बैठते समय अपने शरीर को सीधा रखें। मेरà¥à¤¦à¤‚ड तना रहे। आंखें अधखà¥à¤²à¥€ रहें। चितà¥à¤¤ को अंदर की ओर मोड़ते रहें। साधना का कमरा खाली रहना चाहिà¤à¥¤ कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि सूनेपन में ही सतà¥à¤¯ की तलाश संà¤à¤µ है। और इसी में सचà¥à¤šà¥‡ आनंद की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ होती है। à¥à¤•ार साधना के पà¥à¤°à¤¥à¤® चरण में à¥à¤•ार का उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ तेजी से और जोर से करें ताकि उसकी पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤§à¥à¤µà¤¨à¤¿ खà¥à¤¦ को à¤à¥€ सà¥à¤¨à¤¾à¤¯à¥€ पड़े। आपकी à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ ॠके चिंतन में लगा रहे। यह समठलें कि जीवन की सारà¥à¤¥à¤•ता इसी में है। यह अà¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸ दस मिनट तक जारी रखें। फिर इस साधना के दà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯ चरण में à¤à¥€ चितà¥à¤¤à¤¾ का शांत रहना आवशà¥à¤¯à¤• है। मन को अंदर की ओर मोड़ लें। अब ॠका उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ तेजी से जलà¥à¤¦à¥€-जलà¥à¤¦à¥€ करें। उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ इतनी जलà¥à¤¦à¥€-जलà¥à¤¦à¥€ करें ताकि à¤à¤• से दूसरे उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ के मधय थोड़ा à¤à¥€ अंतराल शेष न बचे। सदा à¤à¤• के बाद à¤à¤• à¥à¤•ार का उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ करते रहें। साथ ही पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤§à¥à¤µà¤¨à¤¿ को खà¥à¤¦ में समाहित करते रहें। इसे पूरà¥à¤£à¤¤: अपने में समाविशà¥à¤Ÿ करते रहें। à¥à¤•ार का उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ लगातार इतना करते रहें कि पूरा कमरा à¥à¤•ार नाद की धà¥à¤µà¤¨à¤¿ -पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤§à¥à¤µà¤¨à¤¿ से à¤à¤° जाये। आप à¥à¤•ार नाद में खो जाà¤à¤‚, उसमें सà¥à¤¨à¤¾à¤¨ करने लगें, डà¥à¤¬à¤•ी लगाने लगें, à¥à¤•ार नाद में तैरने लगें। यह अà¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸ à¤à¥€ दस मिनटों तक जारी रखें। फिर अपने शरीर को शांत छोड़ दें। à¥à¤•ार साधना के तीसरे चरण में आप यह महसूस करें कि अब आप शरीर से निकलकर मन में समा चà¥à¤•े हैं। अपने होठों को बंद कर लें। इस चरण में आपको अपने मà¥à¤‚ह से कà¥à¤› बोलना नहीं है। बलà¥à¤•ि बिना मà¥à¤‚ह खोले ही à¥à¤•ार का गà¥à¤‚जार करें। à¤à¥€à¤¤à¤° ही à¤à¥€à¤¤à¤° होने वाले à¥à¤•ार के इस गà¥à¤‚जन से बाहरी वातावरण गà¥à¤‚जायमान तो होता है पर मà¥à¤‚ह से सà¥à¤µà¤° नहीं फूटते। बाहर मातà¥à¤° गà¥à¤‚जन का नाद सà¥à¤¨à¤¾à¤¯à¥€ देता है, उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ नहीं। यह अà¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸ पांच मिनट तक जारी रखें। संà¤à¤µ है, अà¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸ के दौरान आपको कà¥à¤› कषà¥à¤Ÿ महसूस हो पर उस पर धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ न दें और सरà¥à¤µ सà¥à¤µà¥€à¤•रण की à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ से जो कà¥à¤› हो रहा है, उसे सà¥à¤µà¥€à¤•ार करते रहें। जो सà¥à¤µà¤¤: हो रहा हो, उसका अनà¥à¤à¤µ करें। मन को पूरी तरह अंदर की तरफ मोड़ लें और अपने अंदर से सà¥à¤µà¤¤: पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हो रही अनà¥à¤à¥‚ति का आनंद लें। à¥à¤•ार साधना के चौथे चरण में à¥à¤•ार का बिना मà¥à¤‚ह खोले किया जाने वाला उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ à¤à¥€ बंद कर दें और अंदर जो सà¥à¤µà¤¤: घटित हो रहा है, उसका रसासà¥à¤µà¤¾à¤¦à¤¨ करें। अपने अंदर गौर से निहारें। अपने अंदर सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ à¥à¤•ार का दरà¥à¤¶à¤¨ करें। इसके लिठआप अपने ठोà¥à¥€ को सीने के ऊपर à¤à¥à¤•ा दें और चितà¥à¤¤ को अंदर की ओर ले जायें। आप जà¥à¤¯à¥‹à¤‚ ही अंदर में समायेंगे आपको à¤à¤• अजीब तरह के सà¥à¤– की अनà¥à¤à¥‚ति होने लगेगी और आप à¥à¤•ार को अपने अंदर ही विराजमान पायेंगे। फिर आप अपने अंदर गà¥à¤‚जित होने वाले à¥à¤•ार नाद में खà¥à¤¦ को समाविषà¥à¤Ÿ कर दें और उस विसà¥à¤®à¤¯à¤•ारी आनंद की अनà¥à¤à¥‚ति पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करते रहें। कà¥à¤› समय बाद आप अपने अंदर यह धारणा करें कि आप शरीर से अलग हो गये हैं। जो कà¥à¤› घटित हो रहा है उसे मन और शरीर से अलग होकर देखने लगें। हृदय के नीचे नाà¤à¤¿ पर जो हो रहा है उसकी अनà¥à¤à¥‚ति पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करते रहें। वहां आपको à¤à¤• अपूरà¥à¤µ शांति और आनंद की अनà¥à¤à¥‚ति मिलेगी, उसी अनà¥à¤à¥‚ति में समा जाà¤à¤‚। बस, à¤à¤• बार उस शांति का सà¥à¤µà¤¾à¤¦ लग जाà¤à¥¤ आप धनà¥à¤¯-धनà¥à¤¯ हो जाà¤à¤‚गे। मन बार-बार उसकी सदा कामना करता रहेगा। कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि मन को सà¥à¤µà¤¾à¤¦ की जरूरत है। à¥à¤•ार साधना का उकà¥à¤¤ आखिरी चरण ही पà¥à¤°à¤®à¥à¤– है। इसी में आपको परम-आनंद की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ होती है। अत: धैरà¥à¤¯ को कà¤à¥€ मत तà¥à¤¯à¤¾à¤—ें। बगैर परिणाम की अà¤à¤¿à¤²à¤¾à¤·à¤¾ या फिर किये अà¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸ में खà¥à¤¦ को समा जाने दें। धैरà¥à¤¯ पूरà¥à¤µà¤• इंतजार करें उस समय का जब वह परमानंद पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¤•à¥à¤· होगा। बार-बार किसी बीज को उकेरने से उसे पूरà¥à¤£à¤¤: विकसित होकर फलने-फूलने का अवसर नहीं मिल पाता। समय का इंतजार करें। इस छोटी सी à¥à¤•ार धà¥à¤µà¤¨à¤¿ में इतना पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ है कि आपको जानकर आशà¥à¤šà¤°à¥à¤¯ होगा कि आप अब तक इससे अछूते कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ थे।
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