स्वावगाहन
 

'स्वावगाहन'

छ: सौ खरब कोषिकाओं से बना यह सूक्ष्म शरीर संसार के जटिलतम यंत्रों से सुसज्जित कारखानों से भी जटिल है। मानव शरीर की प्रत्येक अंग प्रत्यंग की अपनी विशेषता एवं विलक्षणता है। आप देखेंगे कि एक सिक्के के बराबर एक आंख का हिस्सा होता है जिसमें एक करोड़ बीस लाख कोन और सत्तार लाख रोड़ कोशिकाएं तथा दस लाख नर्व वाली (ऑप्टिक नर्व) मस्तिष्क के दृष्टि केन्द्र को देखा हुआ दृश्य पहुंचाती हैं। साथ ही याददाशत यानि स्मृति कोश में स्थित चित्रों को पहचान कर अभिव्यक्ति प्रदान करती है। बाह्य जगत को देखने और पहचानने की यह क्रिया आंखों और मस्तिष्क से प्रति क्षण होती रहती है। देखने की इस क्रिया से दूसरों की पहचान तो हो जाती है किन्तु अपने आपको पहचानने के लिए भीतर की आंख की जरूरत होती है। स्वयं द्वारा स्वयं को देखने या अपने में डूबना स्वयं में डूबकी लगाकर स्वयं की पहचान करना अपने आप को जानना का दूसरा नाम ही स्वावगाहन है।

 

-           स्वावगाहन ध्यान जीवन का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह ध्यान 'यथार्थवाद' पर आधारित है जो वातावरण को, परिस्थितियों को, वस्तुओं को यथारूप में हमारे सामने रखती है। बहुत साधारण सा नियम है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। यदि कोई वस्तु हमारी नजर के सामने आये तो हमारे मस्तिष्क में वस्तु से संबंधित, विभिन्न प्रकार के विचार उठना स्वाभाविक है।

 

 

-           'स्वावगाहन' ध्यान, हमारे अतीत और भविष्य की ओर ले जाने वाले विचारों का नियमन करती है, तथा वर्तमान से संबंधित विचार को प्रगति की ओर अग्रसारित करती जाती है।

 

 

-           इस स्वावगाहन के माधयम से, हमें अतीत और भविष्य से छुटकारा पाकर, वर्तमान में जीने की कला आती है। जब हम इस क्रिया को जान जाते है तो लगता है- यह क्रिया कितनी आसान है, कितनी महत्वपूर्ण है और कितनी रहस्यमय है जो हमें वर्तमान में जीने की प्रेरणा देती है, उमंगें देती है और खुशियां देती है।

 

 

- यह स्वावगाहन हमारे सामने से भ्रम के अथवा माया के सारे पर्दे हटाकर हमारे 'तीसरे नेत्र' को जागृत करने में सहायक होती है, जिससे हमें संसार का वास्तविक ज्ञान हो पाता है। जो वस्तु जैसी है, उसे उसी रूप में देखने की क्षमता प्रदान करने का नाम 'स्वावगाहन' है।

 

 

-           'स्वावगाहन' जीवन का एक ऐसा कल्याण है जो परम लक्ष्य तक बड़ी आसानी से पहुंचा देता है। यह चेतना की धर्म गंगा है। तन मन के समस्त तापों को दूर कर सम्पूर्ण आरोग्य लाभ का ही दूसरा नाम 'स्वावगाहन' है।

 

 

-           'स्वावगाहन' अपने आप में अवस्थित परम शांति का नाम है। 'स्वावगाहन' जीवन को मंगलमय बनाने का एक विशिष्ट पथ है।

 

 

-           'स्वावगाहन' अंतर प्रज्ञा जाग्रत करने की एक अनूठी तकनीक है।

 

 

-           जीवन संग्राम के दौरान मनुष्य अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों, उत्तेजनाओं और असंतुलन का शिकार होकर दुखी हो जाया करता है। उसका विवेक और अंतरप्रज्ञा साथ नहीं देते। वह पूर्णत: मानसिक विकृतियों से घिर जाता है। मगर ऐसी प्रत्येक अवस्था के समय प्रज्ञा और विवेक के जागृत होने का दूसरा नाम 'स्वावगाहन' है।

 

 

-           'स्वावगाहन' मानव जीवन की परम औषधि है, जीवन की सही दिशा है। यह मानव जीवन को संवारने की कला है। 'स्वावगाहन' करुणा की निर्मल धारा है। प्रत्येक व्यक्ति 'स्वावगाहन'  का अपने में प्रयोग करके जीवन में परम शांति व परमानंद को प्राप्त कर सकता है।

 

 

-           'स्वावगाहन' सकारात्मक सोच और जीवन को प्रगतिशील बनाने का उपाय है।

 

 

.           स्वावगाहन जीवन का एक समाधान है। एक दिशा है सुख, शांति और वैभव को पाने की।

 

            मेरा मानना है कि SWAWAGAHAN  ध्यान का वो सेतू है जो हमारे भीतर के सारे भावों को, पीड़ा, वेदना को बाहर निकाल फेंकता है और सारे तनावों व सारी कुंठाओं को बाहर निकालता है।

 

 

-           'स्वावगाहन' का श्वांस से गहरा संबंध है और श्वांस का संबंध 'ध्यान' से है। ध्यान का पूरा प्रभाव हमारे क्रियाकलाप और व्यक्तित्व पर पड़ता है।

 

 

-           हम सब लोगों जानते है, जब हम गतिशील, क्रियाशील होते है तो श्वांस की गति अलग प्रकार से चलती है और जब हम शांत रहते तब श्वांस की गति अलग प्रकार की होती है। क्रोध में श्वांस अलग तरह और करुणा में श्वांस अलग होता है।

 

 

-           जब हमारा चित् मौन  रहता है, तब श्वांस अलग होगी, क्योंकि श्वांस ही शरीर और आत्मा को जोड़ने का सेतु है। ऐसा क्यों?

 

 

-           यह एक ऐसा ध्यान है जो हमारे श्वांस को संतुलित करता है और विज्ञान भी इस बात को स्वीकार करता है कि सांस को ठीक प्रकार से न लेने के कारण, फेफड़ों के हजारों छिद्रों में से सिर्फ कुछ ही हजार छिद्र ही काम करते हैं। उससे हमारे मन में बेचैनी, डिपरेशन, टेंशन  जैसी बीमारियों घर कर लेती है।

 

-           यदि इस SWAWAGAHAN को हम अपने जीवन में अपनाये तो हम अपने श्वांसों के

 

            माधयम से ही, अपने जीवन को संतुलित कर सकते है।

 

-           SWAWAGAHAN  हमारे मनीषियों की एक अनूठी खोज है। विशेषकर इस साध्ना की खोज का श्रेय भगवान बुध्द को जाता है जिन्होंने अपने समय में इस क्रिया पर विशेष ध्यान दिया था। वास्तव में यह ध्यान मानव जीवन के लिए बहुत उपयोगी है।  श्वांसों की यह क्रिया मानव जीवन को कई प्रकार के रोगों और पीड़ाओं से मुक्त कराती है। SWAWAGAHAN  जीवन एक अनूठा हिस्सा है। इस ध्यान के प्रयोग से शरीर में एक नई ऊर्जा शक्ति का संचारण होता है और हमारे भावों को नवीनता मिलती है।

 

जीवन एक ऐसा अनमोल उपहार है जो हम जीवों को जीवनदाता द्वारा अति अनुग्रह पूर्वक प्रदान किया गया है। यही वजह है कि अपने जीवन को पूरी समग्रता से जी लेने की गहरी इच्छा हर प्राणी के अंदर जन्म से ही मौजूद रहती है। फलस्वरूप संसार के प्रत्येक प्राणी, चाहे वे छोटे हों या बड़े, सभी जीवित रहना चाहते हैं। कोई प्राणी मरना नहीं चाहता और न ही  कोई दु:ख पाना चाहता है। सभी चाहते हैं कि मेरा जीवन सुखों से परिपूण हो और मैं इसका उपभोग पूरी समग्रता से करूं। मेरा सम्पूर्ण जीवन सुखमय व्यतीत हो, किसी भी प्रकार की प्रतिकूलताएं मेरे जीवन के मार्ग पर दु:ख के कांटें न बिछा दें। अत: जीवित रहने के लिए जो कुछ भी जरूरी है, उसके लिए समस्त प्राणी सदैव प्रयत्नषील रहते हैं और अपने अनमोल जीवन को बचाने के लिए बड़े से बड़े जोखिम को उठाने से भी कतराया नहीं करते।

 

घ्          आपने देखा होगा एक नन्हीं सी चींटी भी अपने जीवन को बचाने और इसे सुखमय बनाने के लिए कितनी सजग व सचेष्ट रहती है। जीवित रहने के लिए आवष्यक आहार और आवास आदि की व्यवस्था करने में वह निरंतर लगी रहती है, साथ ही अगली पीढ़ी की सुरक्षा आदि की भी समुचित व्यवस्था बिना किसी षिकवा-षिकायत के करती रहती है। यही बातें प्रकारांतर से अन्य पषु-पक्षियों पर भी लागू हैं। मनुष्य जिसे सभी प्राणियों का सिरमौर माना गया है, वह भी नैसर्गिक रूप से सुख पूर्वक जीवित रहने और सुख पाने के लिए हमेशा कोशिश करता रहता है। लेकिन मैं पूछता हूं कि यदि अन्य प्राणियों की तरह ही मनुष्य भी अपना जीवन जैसे-तैसे भाग-दौड़ करते हुए ही गुजार दे तो उसमें और अन्य प्राणियों में अंतर ही क्या रह जायेगा? फिर क्यों उसे सभी प्राणियों से श्रेष्ठ बताया गया है? ज्यादातर लोग सोचते हैं कि मानव बुध्दि की विशिष्ट क्षमता की वजह से ही उसे समस्त प्राणियों का सरताज मान लिया गया है। लेकिन हमारे प्राचीन मनीषियों ने इसे कर्म प्रधान योनि होने की वजह से श्रेष्ठ माना है। क्योंकि एकमात्र मनुष्य को ही कर्म करने का विशेषाधिकार मिला हुआ है और यदि वह चाहे तो जन्म-मरण के सनातन भवचक्र से मुक्त होने की विशिष्ट साधना का महान कार्य भी इस मानव शरीर में संपादित कर सकता है।

 

घ्          अधिकांश मनुष्यों का मन मायाकृत प्रपंचों से मोहित हो जाता है और वे इंद्रिय-विषयों की प्राप्ति को ही अपना परम लक्ष्य मान लेते हैं। इस प्रकार वे आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी आदि पंचमहाभूतों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गंध आदि तन्मात्राओं की उपलब्धिा से अपने कान, त्वचा, आंख, नाक, जीभ आदि ज्ञानेन्द्रियों को तृप्त करने के लिए ही अपनी सभी कर्मेन्द्रियों को पूरी तरह लगा देते हैं। इस प्रकार अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इंद्रिय-विषयों का संग्रह करने की जितनी भी कोशिश मनुष्य द्वारा की जाती है, उतनी ही प्रचंडता से नयी कामनाओं की भी आग भड़क उठती है। मनुष्य की ऐसी कोशिश आग को घी से बुझाने के समान मूर्खता भरी होती है, जिससे विषय-वासनाओं की, तरह-तरह की कामनाओं की आग पहले से भी अधिक धधक उठती है।

 

            यही वजह है कि हमारे प्राचीन मनीषियों ने विषयों के भोग में संलिप्त रहने वाली मानसिकता से ऊपर उठने के लिए मनुष्य को बार-बार सचेत किया है। किंतु माया-मोह के बंधन में पड़े लोग प्राचीन मनीषियों के उपदेशों को बड़े हल्के ढंग से लेते हैं और सोचते हैं - ये उपदेश अन्य लोगों के लिए हैं, हमारे लिए नहीं। किंतु याद रहे, हमारे प्राचीन मनीषियों ने जो कुछ भी उपदेश दिया है, मानव मात्र की भलाई के लिए दिया है।

 

            सच कहिए तो हमें उनके उपदेशों व आदेशों पर इस प्रकार से अमल करना चाहिए, मानो वे उपदेश व आदेश मेरे और सिर्फ मेरे लिए हैं। क्योंकि वह मानव मात्र की भलाई के लिए है और मैं भी एक मनुष्य हूं। इसलिए सबसे पहले वे मेरे लिए ही कहे गये हैं। यदि हम इस प्रकार की सोच रखते हैं तो इनसे हमारा अपना ही भला होता है।

          मित्रो, जीवन का जो यह अनमोल उपहार जीवनदाता द्वारा प्रदान किया गया है, वह सबको मिला है। लेकिन क्या कोई व्यक्ति ऐसा सोचता है कि यह तो सबको मिला है, सब लोग जीवन जी ही रहे हैं, फिर मैं क्यों जीऊं? मेरे जीने या न जीने से क्या अंतर पड़ता है? लेकिन हममें से कोई भी ऐसा सोच नहीं पाता बल्कि सभी लोग अपने जीवन को बचाने के लिए पूरी शक्ति से संघर्ष किया करते हैं।

 

             इस संसार में आत्महत्या आदि की जो इक्की-दुक्की घटनाएं घटती हैं, वे भी आत्महत्या करने वालों द्वारा मानसिक संतुलन खो देने की वजह से ही संभव होती हैं और सच पूछिये तो जीवन-मरण के कगार पर पहुंचे उन लोगों को भी यदि अपना जीवन बचा पाने का कोई मौका मिलता है तो वे किसी भी कीमत पर उसके लिए पूरी शक्ति से चेष्टा किया करते हैं।

 

              जानते हैं, इसका कारण क्या है? इसका कारण हमारी अपनी मूल प्रकृति है जो जीवनदाता ने हमें जीवन का अनमोल उपहार देते समय ही पूरी समग्रता से प्रदान कर दिया है। फलस्वरूप एक चींटी से लेकर हाथी तक सभी जीवों को जीवित रहने के लिए हमेशा सचेष्ट रहने का संदेश अंदर से निरंतर प्राप्त होता रहता है। वह हर प्राणी के प्राणों को अनवरत संचालित करते हुए उन्हें हर श्वांस के साथ सजग करती रहती है कि इस जीवन को पूरी समग्रता से जीओ और इसमें समाये परमसुख के अमृत के एक-एक बूंद को समेटते जाओ।

 

            मनुष्य से भिन्न अन्य प्राणियों को प्रारब्धावश जो भी अनुकूल या प्रतिकूल फल उपलब्धा हो रहे हैं, वे उसे भोगा ही करते हैं। किंतु मनुष्य होने के नाते हमें जीवनदाता ने जो एक महान सुअवसर प्रदान किया है, उसका समुचित उपभोग कर हम अपने जीवन के परमलक्ष्य की सिध्दि बड़ी आसानी से कर सकते हैं।

 

            इसके लिए हमें अपने अंदर में प्रवेश कर उस गहराई तक डूबना होगा, जहां से हमारे प्राणों के संचालन का कार्य हो रहा है। वह विशिष्ट कार्य जिसके द्वारा संचालित हो रहा है, उसे जीवनी शक्ति अथवा प्राणों को संचालित करने वाली शक्ति भी कहा जा सकता है। वह क्या और कैसी है, उसे किसी भी माधयम से व्यक्त नहीं किया जा सकता। हमारे प्राचीन मनीषियों ने भी बार-बार स्पष्ट किया है कि वह खुद अनुभव करके जानी जा सकती है, कहकर या लिखकर समझायी नहीं जा सकती। उसे जानने के कार्य में सहयोग देने के लिए किसी ज्ञानी गुरू के द्वारा साध्ना की कोई विशिष्ट युक्ति भले ही मिल जाये किंतु उसका अनुभव खुद ही हासिल करके उसे व्यावहारिक रूप से समझा जा सकता है।

 

            ऐसा नहीं है कि उसे जानबूझ कर किसी को बताया नहीं जाता। लाख कोशिश करने के बाद भी उसे किसी भाषा या इशारों से समझाया नहीं जा सकता। हमारे प्राचीन मनीषियों ने उसे समझने और समझाने के लिए जिन अनेक प्रकार की साधनाओं का उल्लेख किया है। उनमें प्राणों की साधना को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। माना देश, काल, परिस्थितियों के भेद से उन साधनाओं को हमारे प्राचीन मनीषियों व योगाचार्यों ने विविध नामों से पुकारा है किंतु आज के बदलते परिवेश में अधिकांश व्यक्ति योग-साधना व जप-तप आदि का नाम सुनते ही बिदक जाया करते हैं। कुछ लोग सुनी-सुनायी बातों के आधार पर ऐसी मानसिकता की कैद में अपने आप को डाल लेते हैं कि मैं तो एक सामान्य मनुष्य हूं। इस प्रकार की साधनाएं तो सिध्द योगियों के लिए हैं। यह सब मेरे लिए नहीं है।

 

            यही वजह है कि मैं लोगों के समक्ष जो संदेश देता हूं, उनमें इस बात को भली प्रकार से स्पष्ट कर देने की चेष्टा करता हूं कि यह कोई दुरूह योग साधना या भक्ति आदि की कठिन क्रियाएं नहीं हैं। यह तो जीवन को समग्रता पूर्वक जीने की आदर्श कला सिखाने वाली विद्या है जिसे मैं स्वावगाहन कहा करता हूं। यह अद्भुत स्वावगाहन विद्या एक आभ्यांतरिक विज्ञान है जो जीवन के खेल को कुशलता पूर्वक खेलने की कला सिखलाती है। वास्तव में हमारे प्राण तो एक सहज संगीत के नैसर्गिक धुन की तरह हैं जो आपकी श्वांसों के अंदर स्पंदन पैदा कर आपको जीवित रखे हुए हैं। हमारे प्राणों की ताल बध्दता को इस जीवन के अनमोल उपहार का पूरी समग्रता से उपभोग करने वाला एक रोमांचक खेल भी कहा जा सकता है जिसमें संकल्प पूर्वक उतरने के साथ ही मनुष्य को विजयी होने का मैडल निश्चित रूप से ही प्राप्त हो जाता है।

 

      आएं, हम सब स्वावगाहन के माधयम से अपने जीवन की अनमोलता को पहचानने के लिए खेल भावना से अपने अंतरतम की गहराइयों में उतर कर प्राणों में बसे सुगम संगीत पर थिरकते हुए अपने जीवन के परम लक्ष्य तक पहुंचने की कोशिश करें। इसके लिए आएं, सबसे पहले अपने प्राणों से परिचित होने का प्रयास करें और उसी के सहारे जीवन के इस अनमोल उपहार का समग्रता पूर्वक उपभोग करने की चेष्टा करें।

 

            इसके लिए प्रकृति ने समस्त जीवों के शरीर में प्राणों का संचार कर उन्हें प्राणी बना दिया है। उन प्राणों के स्पंदनों से निकले नैसर्गिक संगीत पर थिरकते हुए हम अपने जीवन के खेल की कला में महारत हासिल कर उस विज्ञान को अपने अंतरतम में पूरी समग्रता से समझ सकते हैं। हमारे प्राचीन मनीषियों ने इस विद्या को विविध नामों से पुकारा है जिसे मैं स्वावगाहन कहना ज्यादा पसंद करता हूं। क्योंकि यह 'स्व' में 'अवगाहन' करने की विद्या है, अपने आप में डुबकी लगाने की कला है। आएं, सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त हो सबसे पहले अंतरतम में संचालित प्राणों से परिचित होने का प्रयत्न करें जिसके अभाव में किसी भी प्राणी का जीवित रह पाना संभव नहीं। इसलिए हम सब जीवन के खेल की कला के विज्ञान को समझने के लिए स्वावगाहन के क्षेत्र में प्रवेश करें। उससे पहले एक बार फिर हम इस बात को अच्छी तरह जान लें कि आज स्वावगाहन की आवश्यकता क्यों है?

 

आज स्वावगाहन की आवश्यकता क्यों है?

-           आज के इस अर्थप्रधन भौतिक युग में हर इंसान धन कमाने की लालसा में इतना उलझता जा रहा है कि वह अपने आपको भूल गया है वह उस बुनियादी तथ्य को भूल गया है कि वह उस परमात्मा का अंश है जिससे अखिल ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है।

 

 

-           हमारी आत्मा, जो मूल रूप से परमात्मा का ही अंश है, त्रिगुणमयी माया से मोहित हो इस संसार में विविध् शरीर धारण करती है। जिनमें हमारा मानव शरीर सर्वश्रेष्ठ माना गया है। हालांकि मानव शरीर भी है तो नाशवान, पर आत्मसाक्षात्कार के महत्वपूर्ण कार्य में यही नाशवान शरीर एक महत्वपूर्ण सीढ़ी का कार्य करता है।

 

 

-           लेकिन अफसोस की बात है कि अपने अंशी परमात्मा से मिलने का 'माधयम' बनने वाले इस अति महत्वपूर्ण शरीर रूपी उपकरण को, हमने विषय भोगों में बर्बाद कर आज इसे अनेको प्रकार के रोगों से ग्रसित कर दिया है। हम अपने ही दुश्मन बन चुके हैं। इस संदर्भ में अक्सर कहा भी जाता है कि 'मनुष्य ही अपना शत्रु हुं और मनुष्य ही अपना मित्र', इसका सीधा सा मतलब है, मेरे कर्म और मेरे विचार ही मेरे शत्रु अथवा मित्र हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो अशुभ कर्म व अशुभ विचार ही मनुष्य के शत्रु होते हैं तथा शुभ कर्म व शुभ विचार ही मनुष्य के मित्र हैं।

 

 

-           भौतिकवाद की चकाचौंध् को देखकर मनुष्य इस शरीर को ही सत्य मान बैठा है। अपने शरीर को ही सुख-सुविधायें देना ही मानों मनुष्य का अंतिम लक्ष्य बन गया है। यह मेरा है, यह तेरा है, ऐसा वर्गीकरण करके मनुष्य स्वयं को शरीर की आसक्ति में बांधकर, अंतत: दु:ख ही भोगा करता है। लेकिन जब दु:खों का पहाड़ हमारे ऊपर टूट पड़ता है तब हम तलाश करने लगते हैं उस ईश्वर की, जो सर्वव्यापी है, जो हमारे अंदर भी विद्यमान है, जिसकी सत्ता से हमारे श्वांस चल रहे हैं। श्वांस जो हमको जीवन प्रदान करते हैं, हमारे प्राणों को संचालित करते हैं। जो जीवनदाता है, जो हमारे रक्त विकारों को दूर करते हैं, जो हमारे शरीर के    रोम रोम तक पहुंचकर, हमारे अंदर जीवन जीने की उमंगें बढ़ाते हैं।

 

-           यह एक समान्य समझदारी की बात है कि जहां हम रहते हैं उस स्थान को हम साफ-सुथरा रखते हैं। लेकिन जिस शरीररूपी  घर में 'आत्मा' रहती है, उस शरीर को हम दूषित विचारों से, दूषित भावनाओं से, निराशा के कूड़ा-कर्कट से प्रदूषित करते जा रहे है। फलस्वरूप हमारे अंदर दिन-प्रतिदिन नकारात्मक विचारों का जमघट बढ़ता चला जा रहा है और हमारे गाढ़े पसीने की कमाई का एक बहुत बड़ा भाग डाक्टरों और दवाइयों पर खर्च होता जा रहा है। कहते हैं खर्च से कर्ज बढ़ता है, और मर्ज़ से दर्द बढ़ता है। इस प्रकार दर्द से कराहते लोग उससे मुक्ति के लिए अपने-अपने तरीके से प्रयास करते हैं। किंतु एक प्रकार की पीड़ा से मुक्त होते ही दूसरे प्रकार की पीड़ा सिर पर सवार हो जाती है। ऐसा किसी एक व्यक्ति के साथ नही होता। लगभग सभी पीड़ा के दलदल में फंसे नजर आते हैं।

 

 

-           वास्तव में इस संसार में किसी सुखी आदमी को ढूंढ निकालना टेढ़ी खीर है। यदि हमें कोई सुखी नजर आता है तो उसके नजदीक जाने पर पता चलता है कि वह वास्तव में बहुत दुखी है। अमीर से अमीर व्यक्ति के अंतरमन में झांकने पर हमें पता चलता है कि वह तो गरीबों से भी ज्यादा दुखी है। यदि हम अमीरों की अमीरी में गौर से झांके तो हमें वहां भी विभिन्न प्रकार के दु:ख नजर आयेंगे। कोई धन के बिना दु:खी है, तो कोई धनसंपन्न होने के बाद भी उसे भोग न पाने की अशक्तता से दु:खी है। दु:ख हरेक को है। कोई किसी बात से दु:खी है तो कोई किसी बात से। संसार मे हमें हर तरफ दु:ख ही दु:ख नजर आता है।

 

 

 

-           मानसिक तनाव, क्रोध, चिड़चिड़ापन, क्लेश, चिंता, अनिंद्रा, मादक प्रदार्थों की लत, हीनभावना, अहंकार, असंतुष्टि, भय, व्यग्रता, हृदय रोग, रक्तचाप, और मधुमेह जैसी अनेकों बीमारियों के प्रभाव से हर दूसरा व्यक्ति दु:खी है। इस दु:ख के कारण मनुष्य के अंदर नकारात्मक भावों (Negative Thinking½ में दिन ब दिन बढ़ोतरी होती जा रही है और सकारात्मक भावों ¼Positive hinking½ में लगातार कमी आती जा रही है। फलस्वरूप हम जिन्दगी को बोझ समझकर, निराश होकर उससे दूर भागते जा रहे है।

 

 

-           जिन्दगी भर हम सांसारिक स्तर पर कुछ न कुछ सीखते रहते हैं। हमारे जीवन में विभिन्न प्रकार के ज्ञान-विज्ञान, संगीत व अन्य कलाएं सीखने का दौर चलता ही रहता है। लेकिन सही मायने में क्या हम सही ढंग से जीने की कला भी सीख पाते हैं। शायद नहीं। बावजूद इसके, सभी चाहते हैं कि उनका जीवन खुशहाल हो, शांति से भरा हो और निरोगी काया हो। लेकिन कैसे हो, यह जिज्ञासा प्रत्येक के मन में उठती है। दु:खों से दूर होने का उपाय हमारे धर्मशास्त्रों में, योगशास्त्रों में विभिन्न नामों एवं विभिन्न प्रकारों से बताया गया है। पर धर्मशास्त्रों को, धार्मिक पोथी समझकर एक तरफ रख दिया जाता है और तर्क दिया जाता, धर्मानुकूल आचरण से सिर्फ भिक्षा मांगकर गुजारा किया जा सकता है।

 

 

-           आज धर्म के मायने ही गलत हो गये हैं। धर्म का मतलब किसी कर्मकांड से नहीं हैं, बल्कि 'धर्म' तो एक विशिष्ट प्रक्रिया ;च्तवबमेध्द है जिसका उद्देश्य है मानव समुदाय का 'बहुमुखी विकास' ;डनसजपकलदंउपब कमअमसवचउमदजध्द। लेकिन हमने भौतिक विकास को ही सच्चा विकास मान लिया है। जबकि सच्चा विकास तो तब होता है जब हमारे मन के भावों का उत्तरोत्तर विकास हो। यदि विकास में कोई बाधा आ रही है, तो निश्चित ही हमारे विचार, या कर्म बाधक बन रहे है। तब हमें आवश्यकता पड़ती है उपचार की, हमें आवश्यकता है स्वयं को सुधारने की और आवश्यकता है अपने विचारों को नियंत्रित करने की।

 

 

-           जब मनुष्य को यह बात सुनने को मिलती है कि अपने विचारों को नियंत्रित कर लेने से अपरिमित शक्ति की प्राप्ति होती है तो हर कोई चाहता है कि उसका स्वयं पर, स्वयं के विचारों पर नियंत्रण हो जाये। पर हो कैसे? इसका मार्ग तो धर्मशास्त्रों के पास है अथवा आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त हुये सिध्द पुरुषों और योगियों के पास है। इसलिये मनुष्य आसानी से उपलब्धा होने वाले धर्मशास्त्रों की ओर भागता है। लेकिन उन शास्त्रों की क्लिष्ट भाषा और शब्दावलियों से वह परिचित नहीं होता। इसलिये थककर निराशा के गर्त में डूबने लगता है। इस बात को मैंने महसूस किया और उनके 'सामाजिक संरचना को सुदृढता प्रदान करने वाले प्रयास को और विचारों को' तीव्रतम स्थिति तक लाने के लिये, अपने आसपास के स्वजनों को, धर्मशास्त्रों एवं योगशास्त्रों में वर्णित जटिल प्रक्रियाओं को, अति सरल बनाकर, समझाकर प्रयोग करना शुरू किया, जिसमें मुझे आशातीत सफलता मिली। मैंने लोगों को उसके परिणाम से रू-ब-रू कराया।

 

 

-           मेरा यह छोटा सा प्रयोग आज बरगद के विशाल वृक्ष का रूप धारण कर चुका है। अनेकों व्यक्ति इस सरल योगाभ्यास की प्रक्रिया से फायदा उठाकर अपने जीवन को सार्थक कर रहे हैं। साथ ही जीवन केर् कत्तव्यों को भलीभाँति निभा भी रहे हैं। उनके जीवन में अब तनाव का कोई स्थान नहीं रहा, क्रोध अब उनसे कोसों दूर है।

 

 

-           इस प्रयोग की प्रक्रिया कोई कठिन नहीं है, और न ही कोई कठिन साधना है। न इसमें एकांतवास, और न उपवास की। सिर्फ कुछ दिनों की अवधि वाले इस प्रयोग से ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाभ मिले, इसके लिये मैंने इस प्रायोगिक प्रक्रिया को, नियमित COURSE के रूप में संचालित करने का निर्णय लिया, और उसको नाम दिया स्वावगाहन Self-Contemplation Course - SCC

 

 

- SELF-CONTEMPLATION COURSE - SCC स्वावगाहन को संचालित करने के पीछे मेरा मकसद यह है कि कम से कम भारत का मानव समाज, इस पुरातन विद्या के रहस्य को जानकर, समझकर अपने जीवन को सहज, सुंदर, सरल और सुखमय बनाये। यह COURSE सरल और सहज यौगिक क्रियाओं के परिपूर्ण होने के साथ-साथ इतना प्रभावकारी है, कि मन में छाई निराशा, मानसिक तनाव व अनेकों शारीरिक दोषों को दूर करने की सामर्थ्य रखता है। जिसे कोई भी आसानी से अपनाकर अपने शरीर को पूर्ण रूप से स्वस्थ रख सकता है और सांसारिक तथा आधयात्मिक जीवन के बीच एक उचित संतुलन बना सकता है। यह संतुलन हमारे मन और शरीर के तनावों को दूर करके, जीवन के प्रति सकारात्मक सोच (च्वेपजपअम ज्ीपदापदह) को एक नई दिशा प्रदान करता है। हमारे जीवन को एक व्यवस्थित रूप देता है।

 

 

-           इस SELF-CONTEMPLATION COURSE - SCC के प्रथम भाग में श्वांस की विभिन्न प्रकार की गतियों के बारे में बताकर उनको नियमित करने की युक्ति बतलायी गयी है जिसका अभ्यास कर, श्वांसों को ब्रह्मांड की लय से जोड़ा जाता है। क्योंकि हमारी श्वसन प्रक्रिया विभिन्न अवस्थाओं में, विभिन्न प्रकार की होती है। हर श्वांस की गति में एक भाव होता है और भावों का संबंध हमारे मनोजगत से है। इस प्रकार देखा जाये तो हर श्वांस हमारे मनोजगत को नियंत्रित करता है जो सुख दु:ख को पैदा करने में सहायक है। क्योंकि मन के माधयम से ही सुख-दु:ख की अनुभूति होती है और मन ही संवाहक है विभिन्न विचारों का।

 

 

-           SELF-CONTEMPLATION COURSE - SCC हमें बताता है कि यदि हम अपनी श्वांसों पर ध्यान दें तो मस्तिष्क में उठने वाले, हर प्रकार के विचारों पर नियंत्रण रखा जा सकता है। फिर हम जिस विचार को चाहें उसे नियंत्रित कर सकते है या उन्मुक्त छोड़ सकते हैं। यह हम पर निर्भर करता है। यानी हमारे अंदर अपने विचारों पर नियंत्रण करने की एक अद्भुत क्षमता आ जाती है। इस SELF-CONTEMPLATION COURSE - SCC के माधयम से हमारी श्वांस प्रक्रिया को, हमारे मन में उठने वाले भावों को, कहा जाये तो, हमारे सम्पूर्ण शरीर को एक नई ऊर्जा शक्ति मिलती है जो जीवन जीने की बुनियादी कला को सिखाकर हमें स्वस्थ और सुखमय जीवन जीने का गुर प्रदान करती है।

 

 

-           SELF-CONTEMPLATION COURSE - SCC से हमें पता लगता है कि हम स्वयं अपने आप के अस्तित्व को कैसे व्यक्त करें और अपने आधयात्मिक और सांसारिक जीवन में हमें सही संतुलन कैसे प्राप्त हो। साथ ही यह COURSE हमारे मानस पटल पर ऐसा अनूठा छाप छोड़ता है कि हम बड़ी आसानी से पौराणिक और आधुनिक जगत की अवधरणाओं को आपस में जोड़कर, उसे आज के विज्ञान की कसौटी पर कस कर खरा उतारने की क्षमता से युक्त हो जाते हैं। यह COURSE हमें अंधविश्वास से बाहर निकालकर, हमारे अंदर छिपे 'स्वप्रकाश' का व्यावहािरक बोध भी उपलब्ध् कराता है।

 

 

-           मेरा आप लोगों से केवल यही कहना है कि जितना हम अपने मन और मस्तिष्क में उठने वाले, राग-द्वेष के वैचारिक तरंगों से, उलजलूल के विचारों से दूर रहेंगे, उतना ही हमारे जीवन में उत्साह और अलौकिक शक्ति का संचार होगा। आज का मनुष्य, प्रकृति के अनुकूल आचरण न करके अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारता है और तरह-तरह के शारीरिक एवं मानसिक दु:ख उठाता रहता है और एक समय ऐसा आता है जब वह अपने आपको असहाय और लाचार समझकर पूरी तरह मानसिक तनावों से भर जाता है। ऐसे समय में डाक्टर की दवाइयां काम नहीं आतीं। मनोचिकित्सक भी हाथ खड़ा कर देते हैं। वैसी विकट परिस्थिति में जब बाहर के सारे उपाय व्यर्थ हो जाते हैं तब यह कोर्स आपके लिए बहुत उपयोगी व सहारा देने वाला सिध्द होगा। यह कोर्स अपने आप में स्व-अनुभवगम्य एवं शास्त्र सम्मत है जिसके माध्यम से आपको -

 

 

- मानसिक तनावों से छुटकारा मिलता है।

 

- शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।

 

- अपने आसपास के वातावरण को बारीकी से जानने की शक्ति मिलती है।

 

- जीवन में आशा की एक नई किरण फूटती है और स्वयं के अंदर छिपी उस 'अव्यक्त शक्ति' का आभास होता है, जो हमारी बुनियाद है, जिससे हमारी उत्पत्ति हुई है।

           

SELF-CONTEMPLATION COURSE - SCC में है क्या'?

 

-           SELF-CONTEMPLATION COURSE - SCC में है, 'जीवन जीने की कला' और जीवन को सुख शांति से जीने का मूलमंत्र। इसके माधयम से हमें पता लगता है कि -

 

 

-           हमारे श्वांस का इस विराट जगत के साथ क्या संबंध हैं?

 

-           मेरा जीवन कितना महत्वपूर्ण है।

 

-          मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?

 

-          इस जीवन में मेरेर् कत्तव्य क्या हैं?

 

-          मेरा वास्तविक धर्म क्या है।

 

-         मेरे सुखमय जीवन का रहस्य क्या है।

 

-         'सर्वधर्म समभाव' की बुनियादी अवधरणा क्या है?

 

 

- SELF-CONTEMPLATION COURSE - SCC हमें बताता है कि यदि हम अपने श्वांसों पर ध्यान देंतो मस्तिष्क में उठने वाले हर प्रकार के विचारों पर नियंत्रण रखा जा सकता है। फिर हम जिस विचार को चाहें उसे नियंत्रित कर सकते हैं या उन्मुक्त छोड़ सकते हैं, यह पूरी तरह हम पर निर्भर करता है।

 

 

- SELF-CONTEMPLATION COURSE - SCC हमें बताता है कि हम स्वयं अपने आप के अस्तित्व को कैसे व्यक्त करें और हमें अपने आधयात्मिक जीवन और सांसारिक जीवन में सही संतुलन कैसे प्राप्त हो।

 

SELF-CONTEMPLATION COURSE - SCC की विशेषताएं

 

n     Stress & distress relaxation  दबाव व तनाव मुक्त मन

 

n          Attaining perfection              प्रतिभा का विकास

 

n        Attaining inner strength       आन्तरिक सक्षमता

 

n        Practinsing Concentration   मानसिक एकाग्रता

 

n        Becoming Self-Decisive         स्वनिर्णय क्षमता का विकास

 

n        Developing will-power          दृढ़ संकल्प होना

 

n        Devloping Vital-Force.          जीवनी शक्ति का विकास

 

n        Positive attitude towards life.           जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण

 

A natural way to recovery from : -

 

            n High B.P. n Low B.P. n Calastrol n Obessity n Sugar n Constipation n Gastic-Trouble n Hyper-Acidity  n Kidney-Trouble nAllergy n Rumatism n Troubles of Nervous System n Cronic Cough& cold n Asthemic n Gout n Depression nCervical nBack Ache nMigraine nTuberculosis (T.B.)                     

 

-           यह एक व्यावहारिक COURSE है जिसमें शिक्षार्थी, यौगिक क्रियाओं के माधयम से शरीर की श्वसन प्रक्रिया और रक्त संचार को सामान्य करने का मार्ग जानकर शरीर को निरोग और स्वस्थ बनाता है।

 

 

-           इस व्यावहारिक COURSE में यौगिक क्रियाओं के द्वारा वे रोग जो लाइलाज समझे जाते हैं जैसे दमा, डायबिटीज, कैंसर, डिप्रेशन, माइग्रेन, उच्च रक्तचाप आदि पर बड़ी सरलता से काबू पाया जा सकता है।

 

 

-           इस व्यावहारिक COURSE के माधयम से शिक्षार्थी यह जान सकते हैं कि जीवन में मानसिक एवं शारीरिक तनावों से कैसे मुक्ति पाई जाये।

 

 

-           इस व्यावहारिक COURSE के माधयम से कोई भी मनुष्य अपनी नकारात्मक सोच ¼Negative Thinking½ को सकारात्मक सोच ¼Positive Thinking½ में बदलने की कला को जान जाता है।

 

 

-           इस व्यावहारिक COURSE के माधयम से हमें यह ज्ञान मिलता है कि कैसे हम अपने असाधय रोगों से भी मुक्ति पाने का प्रयास कर सकते हैं। यह निराशा की भावना मिटाने में भी सहायक है। SELF-CONTEMPLATION COURSE - SCC को दो भागों में विभाजित किया गया है -

 

SELF-CONTEMPLATION COURSE –  SCC - I   Basic Course

 

SELF-CONTEMPLATION COURSE -  SCC - II  Semi Advance Course

 

स्वावगाहन के प्रमुख सोपान एवं विधि

 

Self-Contemplation Course - SCC - I   Basic Course  के आठ चरण है

 

1. सूक्ष्म यौगिक क्रियाएं

 

2. आरोग्यकारी आसन

 

3. मुद्रायें

 

4. प्राणविद्या प्रयोग

 

5.स्वावगाहन क्रिया

 

1. निज शक्ति जागरण प्रयोग

 

2. साक्षी भाव का एहसास

 

3. अपना परिचय पाने की जिज्ञासा का सशक्तिकरण प्रयोग

 

4. निज स्वरूप के ज्ञान की प्रतिष्ठा का प्रयोग

 

5. संकल्प की दृढ़ता से मुक्ति की युक्ति का वरण

 

प्रिय मित्रों जिस ध्यान की चर्चा मैंने ऊपर की वह अनुभव का विषय है यदि आप जाना चाहते हैं इस ध्यान में तो संपर्क करें मेरे से में अवश्य आपको सहयोग करूंगा वहां तक पहुँचाने का।