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Kalsurp yog In (Hindi)
 

 

क्या है कालसर्प योग ?

'कालसर्प' एक पारिभाषिक शब्द है। 'काल' का अर्थ मृत्यु होता है। यह लोक विदित है। दूसरे शब्दों में काल यम को कहते हैं, यम अर्थात यमराज जो मृत्यु के अािपति देवता हैं। काल का आदेश होने पर मृत्यु अवश्यम्भावी है। इसी प्रकार विषैले सर्पदंश से अािकतर लोगों की मृत्यु की संभावना रहती है और होती भी है। इसीलिए ही सर्प का नाम सुनते ही लोग सशंकित हो जाते हैं। ज्योतिष शास्त्रा में राहु को कालसर्प का मुँह और केतु को कालसर्प की पूंछ माना गया है। वैसे भी दोनों एक ही शरीर के सिर और ाड़ भाग है। राहु सिर होने से सर्प का मुंह और केतु नीचे ाड़ भाग के कारण पूंछ हैं। ज्योतिष के अनुसार जिस जातक की जन्म कुंडली में राहु और केतु के बीच सारे ग्रह आ जाते हैं, उसे पूर्ण कालसर्प योग माना जाता है। पूर्ण कालसर्प योग को उदित गोलार्द्ध्र या ग्रस्तयोग कहते हैं। यदि एक या दो ग्रह बीच में नहीं आते हैं तो भी कालसर्प योग माना जाता है। ऐसा योग अनुदित गोलार्द्ध या मुक्त योग कहलाता है। किन्तु प्रभावित रहता है।

आयु और कालसर्प योग 

जैसा कि पीछे वर्णन आया है कि कुज सम केतु शनि सम राहु होता है। अर्थात केतु मंगल जैसा फल देता है और राहु शनि जैसा। शनि आयु का कारक ग्रह होता है। किसी की आयु कितनी है, अथवा उसकी मृत्यु कब होगी? ये दोनों बातें एकार्थी हैं। दोनों का एक ही अर्थ होता है। जैसे अािकतर व्यक्ति यह प्रश्न जरूर करते हैं कि पंडित जी मेरी आयु कितनी है? इसका क्या मतलब है? वह जातक सीधे-सीधे यह पूछना चाहता है कि मैं कब मरूंगा?

 मृत्यु का अर्थ यह नहीं होता कि वह अब इस दुनिया से चला गया और अंतिम संस्कार हो गया। शास्त्राों में मृत्यु कई प्रकार की लिखी गयी है। जैसे - माता-पिता द्वारा त्याग दिया जाये, गांव या शहर से अर्थात देश निकाला कर दिया जाये, ार्म से वंचित कर दिया जाये, संतान द्वारा अपमानित किया जाये, कारोबार व व्यवसाय समाप्त हो जाये, अग्नि द्वारा सब कुछ समाप्त हो जाये, आजीवन कारावास हो जाये, किसी अश्लील व अनुचित कार्य की वजह से अपमानित किया जाये आदि। इन बातों से मिलते-जुलते कार्यों से संबंाित घटनाओं को भी मृत्यु कहते हैं।

शास्त्राों में ऐसा वर्णन है कि राहु मनुष्य के ऊपर उस समय हावी होता है जब व्यक्ति किसी न किसी रूप में किसी भी तरह मृत्यु की तरफ चला जाता है। मृत्यु को अंतिम अंजाम राहु-केतु ही देते हैं। ज्योतिष शास्त्रा में ऐसा वर्णन है कि यदि राहु-केतु शुभ ग्रहों की राशियों में बैठे हों और शुभ ग्रह के द्वारा दृष्ट हाें तो ऐसे व्यक्ति की अंतिम यात्राा बड़े अच्छे तरीके से श्माशान घाट तक निकलती है और प्राण भी अच्छे तरीके से अपने परिजनों के बीच में निकलते हैं। जितना ये दोनों अशुभ ग्रहों की राशियों में और अशुभ प्रभाव में होते हैं तो इस शरीर की उतनी ही दुर्दशा चीड़फाड़ होकर अंतिम संस्कार होता है। चाहे व्यक्ति ने जीवन भर कितना ही सत्कर्म किया हो। इसलिए इन वचनों से साफ संकेत मिलता है कि इस जन्म में किये हुए पाप कर्मों या पुण्य कर्मों का फल अगले जन्म में मनुष्य भोगता है।

कालसर्प योग को हमेशा अशुभ योग माना जाता है परंतु यदि राहु और केतु सतोगुणी नक्षत्राों पर हों अर्थात बुध या गुरु के नक्षत्राों पर हो तो यह बहुत ही शुभकारी योग भी बनता है।

 

 
 
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